यूँ तो इंसान मात्र स्वार्थी होता है।हम बिना स्वार्थ के कुछ नही करते हाँ कुछ लोग कुछ भिन्न भी हैं जो निःश्वार्थ किसी के लिए कुछ करतें हैं परंतु उँगलियों पे गिने चुने ही।
हमे अगर यह पता चले किसी ज्योतिष या ज्ञानी जनों से कि पंछियों को दाना दो तो पुण्य होगा,उनके लिए पानी रक्खो तो भला होगा,कौवों को रोटी या मीठा दो तो पूर्वज प्रसन्न होंगे या काले कुत्ते की सेवा करो उसे शनि मंगल रोटी या मीठा खिलाओ तो ग्रह कटेंगे। बंदर को चना खिलाओ तो हनुमान जी खुश होंगे,चींटियों को आटा या चीनी डालो तो खुशहाली और समृद्धि आएगी, गाय को रोटी गुड़ खिलाओ तो गुरु या विष्णु जी प्रसन्न आदि आदि कई टोटके और मशवरे।
परंतु मित्रों क्या आपने कभी सोचा कि इन सबके पीछे उद्देश्य क्या है?
सिर्फ और सिर्फ एक वो है मानवता। हममे जीवों के प्रति दया,प्रेम और कर्तव्य।
लेकिन हम मनुष्य तब तक कुछ नही करते जब तक कि उसमे हमारा स्वार्थ या लाभ निहित न हो।हममे दया,माया,मोह,करुणा,प्रेम सिर्फ अपनो के लिए ही क्यों है?
क्यों नही हम किसी निसहाय चाहे वो मनुष्य हो या की जीव या पेड़ पौधे उन सभी की सेवा निश्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य समझ क्यों नही करते। जबकि हमसे बेहतर पशु पंछी है जो खाना या पानी पाकर भी तब तक ग्रहण नही करते जबतक कि अपने संगे साथियों को नही सम्मिलित करते चाहे वो कितने ही प्यासे या भूखे हों। एकता,सौहार्द और प्रेम हमे उनसे सीखना चाहिए। बिना किसी भेदभाव के सब मिलजुल कर रहतें और हमे एक सन्देश देतें।
वहीं हम इंसान अगर चिड़ियों के लिए पानी रक्खा तो उसे बिल्ली नही पी सकती गाय के लिए रक्खा पानी कोई और पशु नही पी सकता या हम पीने नही देते क्योंकि उससे देवता या ग्रह कुपित हो जायेंगे। जबकि सारे पशु एकसाथ एक ही जगह से पानी पी लेतें हैं बिना किसी भेदभाव के।
पेड़ पौधों से ईश्वर के लिए दूसरों के बगीचों से सुबह सुबह फूल चुराकर ईश्वर को प्रसन्न करतें हैं लेकिन कदाचित भूलकर भी पड़ोसी या उन बगियों में या सड़क किनारे के पेड़ पौधों को पानी नही डालेंगे न ही उन डालियों से नरमी से पेश आएंगे जो हमे छाया देती है शुद्ध वायु और फल फूल तथा औषधि देती है।
मित्रों आओ सब मिलकर इन कलुषित विचारों और भावनाओं से खुद को पृथक कर एक नव निर्माण करें अपने मन,आत्मा,सोच और मानसिकता का। मानवता का कुछ फ़र्ज़ तो निभायें क्यों न एक मिसाल बने आने वाली पीढ़ी के लिए।
बहुत लंबा लेख है ।
किसी को आहत करने का मेरा कोई उद्देश्य नही परंतु ये सत्य और प्रतिदिन घटित होने वाली दिनचर्या है।सादर.....
मौली
हमे अगर यह पता चले किसी ज्योतिष या ज्ञानी जनों से कि पंछियों को दाना दो तो पुण्य होगा,उनके लिए पानी रक्खो तो भला होगा,कौवों को रोटी या मीठा दो तो पूर्वज प्रसन्न होंगे या काले कुत्ते की सेवा करो उसे शनि मंगल रोटी या मीठा खिलाओ तो ग्रह कटेंगे। बंदर को चना खिलाओ तो हनुमान जी खुश होंगे,चींटियों को आटा या चीनी डालो तो खुशहाली और समृद्धि आएगी, गाय को रोटी गुड़ खिलाओ तो गुरु या विष्णु जी प्रसन्न आदि आदि कई टोटके और मशवरे।
परंतु मित्रों क्या आपने कभी सोचा कि इन सबके पीछे उद्देश्य क्या है?
सिर्फ और सिर्फ एक वो है मानवता। हममे जीवों के प्रति दया,प्रेम और कर्तव्य।
लेकिन हम मनुष्य तब तक कुछ नही करते जब तक कि उसमे हमारा स्वार्थ या लाभ निहित न हो।हममे दया,माया,मोह,करुणा,प्रेम सिर्फ अपनो के लिए ही क्यों है?
क्यों नही हम किसी निसहाय चाहे वो मनुष्य हो या की जीव या पेड़ पौधे उन सभी की सेवा निश्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य समझ क्यों नही करते। जबकि हमसे बेहतर पशु पंछी है जो खाना या पानी पाकर भी तब तक ग्रहण नही करते जबतक कि अपने संगे साथियों को नही सम्मिलित करते चाहे वो कितने ही प्यासे या भूखे हों। एकता,सौहार्द और प्रेम हमे उनसे सीखना चाहिए। बिना किसी भेदभाव के सब मिलजुल कर रहतें और हमे एक सन्देश देतें।
वहीं हम इंसान अगर चिड़ियों के लिए पानी रक्खा तो उसे बिल्ली नही पी सकती गाय के लिए रक्खा पानी कोई और पशु नही पी सकता या हम पीने नही देते क्योंकि उससे देवता या ग्रह कुपित हो जायेंगे। जबकि सारे पशु एकसाथ एक ही जगह से पानी पी लेतें हैं बिना किसी भेदभाव के।
पेड़ पौधों से ईश्वर के लिए दूसरों के बगीचों से सुबह सुबह फूल चुराकर ईश्वर को प्रसन्न करतें हैं लेकिन कदाचित भूलकर भी पड़ोसी या उन बगियों में या सड़क किनारे के पेड़ पौधों को पानी नही डालेंगे न ही उन डालियों से नरमी से पेश आएंगे जो हमे छाया देती है शुद्ध वायु और फल फूल तथा औषधि देती है।
मित्रों आओ सब मिलकर इन कलुषित विचारों और भावनाओं से खुद को पृथक कर एक नव निर्माण करें अपने मन,आत्मा,सोच और मानसिकता का। मानवता का कुछ फ़र्ज़ तो निभायें क्यों न एक मिसाल बने आने वाली पीढ़ी के लिए।
बहुत लंबा लेख है ।
किसी को आहत करने का मेरा कोई उद्देश्य नही परंतु ये सत्य और प्रतिदिन घटित होने वाली दिनचर्या है।सादर.....
मौली
आखिर चिड़िया क्यों हमारे आँगन में नहीं फुदकती? क्या वह हमसे नाराज है? या फिर वह हमसे कुछ कहना चाहती है? दरअसल चिड़ियाएं कभी किसी से नाराज नहीं होतीं। नाराज होना तो उनके स्वभाव में ही नहीं है। वे तो यह समझ ही नहीं पा रही हैं कि अब घरों में उसके लिए जगह क्यों नहीं है? उसके लिए दाने पानी के कटोरे अब कहीं-कहीं ही देखने को मिलते हैं। ऐसा क्यों है, यह सोचना उसका काम नहीं। सोचना तो हमें है कि आखिर चिड़ियाएं अब घरों के अंदर बेखौफ होकर क्यों नहीं आतीं? बसेरे के लिए अब उतने घने दरख्त भी कहां बचे, जहां वह अपने बच्चों को सुरक्षित रखकर दाने पानी की तलाश में निकल सके। पेड़ और इंसान के दरो-दीवार उसके विश्वास और भरोसे के दायरे से धीरे-धीरे अब दूर होने लगे हैं। बिना किसी अंतर के हम देंगे उसे दाना पानी। हम रखेंगे उसका खयाल। हम सिद्ध कर देंगे कि हम उस पर आश्रित हैं, वह हम पर नहीं।हम प्रतीक्षा करेंगें दाना पानी लेकर चिड़िया का और अन्य पशु-पंछियो का । वह आएगी, दाना चुगेगी और चोंच में दबाकर चली जाएगी।
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